जमीन या मकान की खरीद में सबसे बड़ा नुकसान रजिस्ट्री के बाद नहीं, बल्कि रजिस्ट्री से पहले की गई लापरवाही से होता है। रजिस्ट्री सिर्फ़ यह दर्ज करती है कि सौदा हुआ — यह इस बात की गारंटी नहीं है कि बेचने वाला वाकई मालिक था। इसलिए पैसा देने से पहले कागज़ों की जांच ही असली सुरक्षा है।
सबसे पहले: टाइटल की जांच
टाइटल सर्च का मतलब है यह पता लगाना कि संपत्ति पिछले कई दशकों में किस-किस के हाथ से गुज़री और मौजूदा विक्रेता को मालिकाना हक कैसे मिला। आमतौर पर पिछले 30 वर्षों की दस्तावेज़ों की श्रृंखला देखी जाती है। इसके लिए ये कागज़ जांचे जाते हैं:
- मूल बैनामा या सेल डीड, और उससे पहले के मालिकों के दस्तावेज़
- बिहार में जमाबंदी, खतियान और रजिस्टर-2 की प्रविष्टि; अन्य राज्यों में खसरा-खतौनी या संबंधित राजस्व अभिलेख
- भार-मुक्ति प्रमाण पत्र (Encumbrance Certificate) — इससे पता चलता है कि संपत्ति पर कोई लोन या गिरवी तो नहीं है
- यदि संपत्ति विरासत में मिली है तो उत्तराधिकार प्रमाण पत्र या वंशावली
- बंटवारे का दस्तावेज़, यदि संयुक्त संपत्ति का बँटवारा हुआ हो
खरीदने से पहले यह ज़रूर देखें
- विक्रेता वास्तव में मालिक है या सिर्फ़ कब्ज़ेदार — कब्ज़ा और मालिकाना हक अलग-अलग चीज़ें हैं
- यदि संपत्ति संयुक्त परिवार की है तो सभी हिस्सेदारों और उत्तराधिकारियों की सहमति और हस्ताक्षर
- संपत्ति पर कोई मुकदमा, स्टे ऑर्डर या विवाद तो लंबित नहीं है
- बैंक से कोई कर्ज़ लिया गया हो तो उसका नो-ड्यूज़ और मूल दस्तावेज़ बैंक से मुक्त हुए या नहीं
- भूमि का उपयोग — कृषि, आवासीय या व्यावसायिक। कृषि भूमि पर सीधे मकान बनाने पर रोक हो सकती है
- सरकारी अधिग्रहण की कोई सूचना या सड़क-चौड़ीकरण की योजना तो नहीं है
- प्लॉट या फ्लैट है तो नक्शे की स्वीकृति और लेआउट अनुमोदन
- बकाया लगान, नगर निगम कर, बिजली और पानी का बिल
बयाना देने से पहले जांच कराएं, बाद में नहीं। बयाना दे देने के बाद अगर कागज़ों में खोट निकलता है तो पैसा वापस लेना अपने आप में एक लंबा मुकदमा बन जाता है।
एग्रीमेंट टू सेल (बयाना)
बयाना केवल रकम की रसीद नहीं होना चाहिए। एक ठीक से लिखे गए एग्रीमेंट में ये बातें साफ़ होनी चाहिए — कुल कीमत और भुगतान का तरीका, रजिस्ट्री की अंतिम तारीख, कब्ज़ा कब मिलेगा, स्टाम्प ड्यूटी कौन देगा, विक्रेता की ओर से यह घोषणा कि संपत्ति विवाद और भार से मुक्त है, और यदि कोई पक्ष मुकर जाए तो क्या परिणाम होगा।
रजिस्ट्री की प्रक्रिया
स्टाम्प ड्यूटी और अन्य खर्च
स्टाम्प ड्यूटी राज्य के अनुसार अलग होती है और सर्किल रेट या वास्तविक कीमत, जो भी अधिक हो, उस पर लगती है। सामान्य तौर पर दिल्ली में पुरुष खरीदार के लिए 6 प्रतिशत और महिला खरीदार के लिए 4 प्रतिशत स्टाम्प ड्यूटी तथा 1 प्रतिशत रजिस्ट्रेशन शुल्क लगता है। बिहार में सामान्यतः 6 प्रतिशत स्टाम्प ड्यूटी और 2 प्रतिशत रजिस्ट्रेशन शुल्क लगता है, जिसमें पुरुष से महिला के नाम हस्तांतरण पर छूट का प्रावधान है।
इसके अलावा, यदि संपत्ति का मूल्य 50 लाख रुपये या उससे अधिक है, तो खरीदार को भुगतान करते समय आयकर अधिनियम की धारा 194-IA के तहत 1 प्रतिशत टीडीएस काटकर सरकार को जमा करना होता है और फॉर्म 26QB भरना होता है।
स्टाम्प ड्यूटी, रजिस्ट्रेशन शुल्क, छूट और सर्किल रेट राज्य सरकारें समय-समय पर बदलती हैं। रजिस्ट्री की तारीख पर लागू वर्तमान दर की पुष्टि सब-रजिस्ट्रार कार्यालय या अपने अधिवक्ता से अवश्य करा लें।
रजिस्ट्री के बाद के काम
- दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) कराना — यह सबसे ज़्यादा टाला जाने वाला और सबसे ज़रूरी कदम है
- नगर निगम या पंचायत रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराना और संपत्ति कर की रसीद अपने नाम से लेना
- बिजली और पानी के कनेक्शन अपने नाम पर ट्रांसफर कराना
- मूल दस्तावेज़ की स्कैन कॉपी सुरक्षित रखना
आम धोखाधड़ी जिनसे बचें
- एक ही ज़मीन को कई लोगों को बेच देना
- पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर बेचना, जबकि वह पावर ऑफ अटॉर्नी रद्द हो चुकी हो
- बिना रजिस्ट्री के केवल एग्रीमेंट या पावर ऑफ अटॉर्नी पर संपत्ति खरीदना
- उत्तराधिकारियों की सहमति के बिना विरासती संपत्ति की बिक्री
- कीमत कागज़ में कम दिखाना — इससे बाद में आयकर और कानूनी दोनों समस्याएँ खड़ी होती हैं
जमीन के कागज़ जँचवाने हैं?
बयाना देने से पहले टाइटल सर्च और दस्तावेज़ों की जांच करा लेना सबसे सुरक्षित रहता है।