बहुत से छोटे व्यापारी यह मानकर चलते हैं कि जीएसटी रजिस्ट्रेशन सिर्फ़ बड़े कारोबार के लिए है। हकीकत यह है कि कुछ स्थितियों में टर्नओवर चाहे एक रुपये का हो, रजिस्ट्रेशन कानूनन अनिवार्य है। नीचे दोनों बातें अलग-अलग समझाई गई हैं — टर्नओवर की सीमा, और वे मामले जहाँ सीमा मायने ही नहीं रखती।
टर्नओवर की सीमा
सामान्य श्रेणी के राज्यों में — जिनमें दिल्ली और बिहार दोनों शामिल हैं — सीमा इस प्रकार है:
| कारोबार का प्रकार | वार्षिक टर्नओवर की सीमा |
|---|---|
| केवल वस्तुओं (goods) की आपूर्ति | 40 लाख रुपये |
| सेवाओं (services) की आपूर्ति | 20 लाख रुपये |
| विशेष श्रेणी के राज्य — वस्तु / सेवा | 20 लाख / 10 लाख रुपये |
यहाँ टर्नओवर का मतलब है पूरे भारत में एक ही पैन पर हुई कुल आपूर्ति — इसमें कर-मुक्त बिक्री भी जुड़ती है, सिर्फ़ कर योग्य बिक्री नहीं।
जहाँ रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है, टर्नओवर चाहे कुछ भी हो
- एक राज्य से दूसरे राज्य में वस्तुओं की आपूर्ति करने वाले
- ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से बिक्री करने वाले विक्रेता
- ई-कॉमर्स ऑपरेटर स्वयं
- कैजुअल टैक्सेबल पर्सन — जैसे प्रदर्शनी या मेले में अस्थायी रूप से बिक्री करने वाले
- रिवर्स चार्ज के तहत कर देने के लिए उत्तरदायी व्यक्ति
- अनिवासी कर योग्य व्यक्ति
- टीडीएस या टीसीएस काटने के लिए उत्तरदायी व्यक्ति
- किसी अन्य पंजीकृत व्यक्ति की ओर से आपूर्ति करने वाले एजेंट
ज़रूरी दस्तावेज़
- कारोबार का पैन कार्ड
- प्रोपराइटर, साझेदारों या निदेशकों का आधार और पैन
- पासपोर्ट साइज़ फोटो
- कारोबार के पते का प्रमाण — बिजली बिल, संपत्ति कर की रसीद, किरायानामा और मकान मालिक की एनओसी
- बैंक खाते का विवरण — रद्द चेक या बैंक स्टेटमेंट का पहला पन्ना
- साझेदारी विलेख, या कंपनी के मामले में निगमन प्रमाणपत्र और डिजिटल हस्ताक्षर
रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया
यदि विभाग को कोई जानकारी अधूरी लगे तो वह स्पष्टीकरण माँग सकता है। इसका उत्तर तय समय के अंदर देना ज़रूरी है, वरना आवेदन निरस्त हो सकता है।
रजिस्ट्रेशन के बाद कौन से रिटर्न भरने होते हैं
| रिटर्न | किसलिए |
|---|---|
| GSTR-1 | बाहर की गई आपूर्ति यानी बिक्री का विवरण |
| GSTR-3B | कर की देनदारी और इनपुट टैक्स क्रेडिट का सारांश तथा भुगतान |
| GSTR-9 | वार्षिक रिटर्न |
| CMP-08 और GSTR-4 | कंपोजीशन स्कीम चुनने वालों के लिए |
रिटर्न भरने की अवधि मासिक है या तिमाही, यह टर्नओवर और चुनी गई स्कीम पर निर्भर करता है। ध्यान रहे — कारोबार में कोई बिक्री न होने पर भी शून्य (nil) रिटर्न भरना अनिवार्य है। लगातार रिटर्न न भरने पर विलंब शुल्क लगता है और रजिस्ट्रेशन रद्द भी हो सकता है।
कंपोजीशन स्कीम
छोटे कारोबारियों के लिए एक सरल विकल्प है, जिसमें कर की दर कम होती है और रिटर्न कम भरने पड़ते हैं। बदले में इनपुट टैक्स क्रेडिट का लाभ नहीं मिलता, अंतर-राज्यीय बिक्री नहीं की जा सकती, और ग्राहक से जीएसटी अलग से नहीं वसूला जा सकता। यह स्कीम उन्हीं के लिए उपयुक्त है जिनके ग्राहक ज़्यादातर अंतिम उपभोक्ता हैं।
ई-वे बिल और ई-इनवॉइसिंग
तय राशि से अधिक मूल्य के माल की ढुलाई पर ई-वे बिल बनाना ज़रूरी होता है — सामान्यतः यह सीमा 50,000 रुपये है। वहीं एक निर्धारित टर्नओवर से ऊपर के कारोबार के लिए ई-इनवॉइसिंग अनिवार्य है, जिसमें हर बिल पोर्टल से प्रमाणित कराना होता है। यह सीमा सरकार समय-समय पर घटाती रही है, इसलिए अपने कारोबार पर लागू वर्तमान सीमा की पुष्टि करा लें।
रजिस्ट्रेशन न कराने पर
अनिवार्य होने के बावजूद रजिस्ट्रेशन न कराना या कर न चुकाना दंडनीय है। सामान्य चूक की स्थिति में देय कर का 10 प्रतिशत जुर्माना लगता है, जो न्यूनतम दस हज़ार रुपये होता है। जानबूझकर कर चोरी के मामलों में जुर्माना देय कर के बराबर तक हो सकता है, और बड़ी राशि की चोरी पर अभियोजन का प्रावधान भी है।
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