चेक बाउंस होना सिर्फ़ पैसों का नुकसान नहीं है — यह एक दंडनीय अपराध भी है। लेकिन इसमें सबसे बड़ी बात समय है। कानून ने हर कदम के लिए तारीख तय कर रखी है, और एक भी तारीख निकल जाने पर मुकदमा दायर करने का अधिकार ख़त्म हो सकता है। इसीलिए चेक लौटने के बाद इंतज़ार करना सबसे महँगी गलती साबित होती है।
चेक बाउंस कब माना जाता है?
जब आप चेक बैंक में लगाते हैं और बैंक उसे बिना भुगतान किए वापस कर देता है, तो उसे चेक का अनादर या चेक बाउंस कहते हैं। बैंक इसके साथ एक रिटर्न मेमो देता है जिसमें कारण लिखा होता है। आम कारण ये होते हैं:
- खाते में पर्याप्त राशि न होना (Insufficient Funds)
- हस्ताक्षर का मेल न खाना (Signature Mismatch)
- खाता बंद हो जाना (Account Closed)
- भुगतान रोक देना (Stop Payment)
- चेक की तारीख निकल जाना या शब्दों और अंकों में राशि अलग-अलग होना
धारा 138 मुख्य रूप से तब लागू होती है जब चेक खाते में पैसे न होने के कारण या तय सीमा से अधिक राशि के कारण लौटा हो। खाता बंद होने और भुगतान रोकने जैसे मामलों में भी अदालतों ने कई परिस्थितियों में इस धारा को लागू माना है। इसीलिए रिटर्न मेमो को संभालकर रखना ज़रूरी है — वही आपके केस का आधार है।
बैंक से मिला रिटर्न मेमो और मूल चेक सुरक्षित रख लें। इनकी फोटो भी खींच लें। इन दोनों के बिना धारा 138 के तहत शिकायत दायर नहीं की जा सकती।
समय-सीमा — यही सबसे अहम है
पूरी प्रक्रिया चार चरणों में चलती है, और हर चरण की अपनी समय-सीमा है:
अगर 30 दिन के अंदर नोटिस नहीं भेजा गया, तो उस चेक पर केस नहीं बनता। हालाँकि, अगर चेक अब भी वैध है तो उसे दोबारा बैंक में लगाकर नए सिरे से प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। शिकायत दायर करने में देरी हो जाए तो अदालत के सामने पर्याप्त कारण बताकर देरी माफ़ कराने का प्रावधान है, पर यह अदालत के विवेक पर निर्भर करता है — इस पर भरोसा नहीं किया जाना चाहिए।
ज़रूरी दस्तावेज़
- मूल बाउंस हुआ चेक
- बैंक का रिटर्न मेमो
- भेजे गए कानूनी नोटिस की कॉपी, डाक रसीद और डिलीवरी का सबूत
- जिस लेन-देन के लिए चेक मिला था उसका प्रमाण — बिल, इनवॉइस, एग्रीमेंट, बैंक स्टेटमेंट या उधार का लिखित रिकॉर्ड
- अपना पहचान पत्र और पता प्रमाण
सज़ा और मुआवज़ा
धारा 138 के तहत दोषी पाए जाने पर दो साल तक की क़ैद, या चेक की राशि से दोगुनी तक का जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं। व्यवहार में ज़्यादातर मामलों में अदालतें जुर्माने और मुआवज़े का आदेश देती हैं।
दो और प्रावधान शिकायतकर्ता के लिए उपयोगी हैं। मुकदमे के दौरान अदालत आरोपी को चेक राशि का 20 प्रतिशत तक अंतरिम मुआवज़ा देने का आदेश दे सकती है। और अगर आरोपी सज़ा के ख़िलाफ़ अपील करता है, तो अपीलीय अदालत उससे कम से कम 20 प्रतिशत राशि जमा कराने का आदेश दे सकती है।
केस कहाँ दायर होगा?
2015 के संशोधन के बाद यह स्पष्ट है कि शिकायत उस जगह की अदालत में दायर होगी जहाँ शिकायतकर्ता के बैंक की वह शाखा है जिसमें चेक जमा किया गया था। इससे शिकायतकर्ता को दूसरे शहर जाकर मुकदमा लड़ने की मजबूरी नहीं रहती।
अगर आपके ख़िलाफ़ केस दर्ज हुआ है
नोटिस मिलने का मतलब यह नहीं कि आप दोषी हैं। बचाव के कई आधार हो सकते हैं — जैसे कि चेक किसी वैध देनदारी के बदले नहीं दिया गया था, नोटिस तय समय में या सही पते पर नहीं भेजा गया, चेक केवल सुरक्षा (security) के तौर पर दिया गया था, या राशि पहले ही चुकाई जा चुकी है।
सबसे अहम बात — नोटिस को नज़रअंदाज़ न करें। 15 दिन की अवधि में भुगतान करके या समझौता करके मामला वहीं ख़त्म किया जा सकता है। यह अपराध समझौता योग्य है, यानी मुकदमे के किसी भी चरण में दोनों पक्ष आपसी सहमति से इसे निपटा सकते हैं।
अक्सर होने वाली गलतियाँ
- रिटर्न मेमो खो देना या बैंक से उसकी कॉपी न लेना
- नोटिस मौखिक रूप से या सिर्फ़ फ़ोन पर देना — नोटिस लिखित और रजिस्टर्ड डाक से ही मान्य है
- 30 दिन की समय-सीमा निकल जाने के बाद वकील से संपर्क करना
- 15 दिन पूरे होने से पहले ही शिकायत दायर कर देना, जिससे केस समय से पहले (premature) हो जाता है
- उधार या लेन-देन का कोई लिखित सबूत न रखना
चेक बाउंस का मामला है?
चेक और रिटर्न मेमो साथ रखें और सीधे बात करें। समय-सीमा निकलने से पहले कदम उठाना ज़रूरी है।